कार्बन-चक्र अनुसंधान

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आईपीसीसी की चौथी आकलन रिपोर्ट में मानवजनित ग्रीन हाउस गैस उत्‍सर्जन, विशेष रूप से CO2, और ग्‍लोबल वार्मिंग के बीच सुस्‍पष्‍ट रूप से लिंक स्‍थापित किया जा चुका है परंतु अभी भी वैश्‍विक कॉर्बन चक्र, विशेष रूप से भू और समुद्री स्रोतों और CO2 के स्‍तरों के बारे में हमारे ज्ञान में अभी भी कई विसंगतियां है । इस अनिश्‍चितता को कम करने के लिए, विशेष रूप से प्रदेश और देश-वार उत्‍सर्जन और CO2 उर्त्‍सजनों को सीमित करने हेतु अंतर्राष्‍ट्रीय संधियों पर विचार विमर्श करने में सूचना आधारित पहलों के साथ-साथ भावी उत्‍सर्जन प्रवृतियों के प्रभावों के विश्‍वसनीय आकलन की समझ सर्वोपरि है । 

प्रकाश संश्‍लेषण, श्‍वसन, पौधों की वृद्धि, और ह्रास, पारिप्रणाली गतिकी, रासायनिक गतिज और परिवहन, जैसी सम्‍मिलित प्रक्रियाओं की जटिलता के कारण स्‍थलीय और समु्द्री कार्बन चक्रों का परिमात्रीकरण करना काफी कठिन कार्य है । इसके लिए प्रेक्षणों और मॉडलिंग के विवेकसम्‍मत मिश्रण के माध्‍यम से काफी अच्‍छी प्रगति की जा सकती है । अत: भारत के लिए यह दूरदर्शितापूर्ण होगा कि वह अगली योजना के दौरान इस क्षेत्र में तीव्र प्रगति की योजना बनाए ।

भारत और उसके आसपास के समुद्रों से प्राप्‍त सुस्‍पष्‍ट जीएचजी फलक्‍स के अनुमान में उच्‍च गुणवत्‍ता वाली वायुमंडलीय जीएचजी मापों और निम्‍न फलक्‍स की प्रतिलोमन मॉडलिंग का संश्‍लेषण शामिल है । डब्‍ल्‍यूएमओ/जीएडब्‍ल्‍यू द्वारा स्‍थापित की गई माप की सटीक मांग CO2 के लिए 0.01 पीपीएम और CH4 के लिए 1 पीपीबी है, जिसके लिए हम पृष्‍ठभूमि मापों में काफी छोटे अंतर वार्षिक-विभिन्‍न सिंग्‍नल प्राप्‍त करने की कोशिश करते है जो काफी व्‍यापक क्षेत्रों का प्रतिनिधित्‍व करते है । डब्‍ल्‍यूएमओ/जीएडब्‍ल्‍यू ने भागीदारी प्रयोगशालाओं के लिए कार्यविधियां स्‍थापित की है ताकि इन मानकों का स्‍तर बनाए रखा जा सके और भारत के लिए अपने माप कार्यक्रम की विश्‍वसनीयता स्‍थापित करने हेतु इस गतिविधि में भाग लेना आवश्‍यक है ।

हमारा अनुमान है कि भारत और इसके आस-पास क्षेत्रों से जीएचजी फ्लक्‍स के सुस्‍पष्‍ट क्षेत्रीय अनुमानों को प्राप्‍त करने के लिए फ्लक्‍स और स्‍व स्‍थाने ~ 20 जीएचजी माप स्‍टेशनों दोनों, के नेटवर्क स्‍थापित करने की आवश्‍यकता है । चूंकि इन स्‍टेशनों की स्‍थापना और रख रखाव काफी खर्चीला है, अनुभव जनित त्रुटियों की न्‍यूनतमता से अधिकतम लाभ प्राप्‍त करने के लिए एक विश्‍लेषणात्‍मक रूप से डिजाइन की गई नेटवर्क नीति की आवश्‍यकता है । अंतिम परिशुद्धता, बैकट्रेजेक्‍ट्री विश्‍लेषण और नेटवर्क डिजाइन के संश्‍लेषण पर आधारित होगी ।

मापो के घनत्‍व के साथ प्रतिलोमन की जटिलता भी बढ़ेगी । संश्‍लेषण प्रतिलोमन पर आधारित अपरिष्‍कृत (स्‍थानिक से लेकर कालिक) विभेदन से हमें पूर्ण स्‍केल 4 डी परिवर्तनीय सम्‍मिश्रण में प्रगति करनी होगी जिसमें विश्‍व से कहीं भी उत्‍सर्जित की गई CO2 की संपूर्ण अंतिम स्‍थिति को समझने की क्षमता होगी ।

12वीं योजना में गतिविधि का प्रमुख फोकस विभिन्‍न पृथ्‍वी-प्रणाली घटकों (वायुमंडल, भू और समुद्र) में जैव भू रासायनिक मॉडलों (कॉर्बन, नाईट्रोजन, सिलिका, फासफोरस, लौह चक्रों) की परिशुद्धता पर होगा। इसमें विभिन्‍न प्रेक्षण कार्यक्रमों (जीव विज्ञानी और रासायनिक समुद्र वैज्ञानिक जलयात्राएं, समुद्री और स्‍थलीय उत्‍पादकता की रिमोट सेंसिग) और स्‍थलीय और समुद्री पारिप्रणाली मॉडलों के विकास के बीच निकट सहक्रिया शामिल है । इन को अंतत: पृथ्‍वी प्रणाली मॉडलों (ईएसएम) में एकीकृत किया जाएगा जिनमें भावी जलवायु प्रभावों के पूर्वानुमान देने की क्षमता होगी जिसमें समुद्री अम्‍लीकरण, जैव विविधता और उत्‍पादकता की हानि भी शामिल होगी । ये ईएसएम हमें जलवायु – परिवर्तन प्रशमन जैसे कि समुद्री उर्वरण तथा भावी स्‍कीमों हेतु नीतियों का मूल्‍यांकन करने में सहायता देंगे ।

क) उद्देश्‍य :

(i)जानकारी/जानकारी संबंधी उत्‍पाद:

स्रोतों, सिंक्‍स और जैवभूरसायनिक परस्‍पर क्रियाओं की विस्‍तृत जानकारी ।

  1. जीएचजी फ्लक्‍स के क्षेत्रीय अनुमानों का काफी सुस्‍पष्‍ट अनुमान ।
  2. एक अत्‍याधुनिक पृथ्‍वी – प्रणाली मॉडल जो कि 5वें आईपीसीसी आकलन का भाग होगा ।

(ii)स्‍थलीय पारिप्रणाली और इसके कॉर्बन ग्रहण क्षमता का विस्‍तृत आकलन ।

(iii)उपकरण प्रणालियां और प्रौद्योगिकी

0.01 पीपीएम CO2 और 1 पीपीबी CH4 की परिशुद्धता क्षमता वाला अत्‍याधुनिक जीएचजी माप नेटवर्क ।

अत्‍याधुनिक जीसी और मात्रा स्‍पेक्‍स के साथ एक विश्‍लेषण केंद्र जो कि उपरोक्‍त परिशुद्धता प्रदान कर सके । यह केंद्र डब्‍ल्‍यूएमओं मानकों का सख्‍ती से अनुपालन सुनिश्‍चित करेगा ।

ख)प्रतिभागी संस्‍थान:

  1. भारतीय उष्‍णदेशीय मौसम विज्ञान केंद्र,पुणे
  2. शैक्षणिक और आर एंड डी संस्‍थान

ग) कार्यान्‍वयन योजना

  1. एक राष्‍ट्रीय स्‍तर की परिचालन और परियोजना परामर्शी समिति, वैज्ञानिक अध्‍ययन के कार्यान्‍वयन हेतु मार्गदर्शन करेगी ।

घ) डेलीवरेब्‍लस:

  1. चिन्‍हित कॉर्बन स्रोतों, सिंक्‍स और संबंधित स्‍थलीय जैव-भू रासायनिक परस्‍परक्रियाओं का विश्‍लेषण ।
  2. स्‍थलीय कॉर्बन ग्रहण क्षमता का आकलन
  3. भारत में अनुसंधान सहयोग के लिए सभी आवश्‍यक उपकरण प्रणालियां और प्रौद्योगिकियां निर्मित करना

ङ)बजट आवश्‍यक : 170 करोड रू.

(रू. करोड में)

बजट आवश्‍यक
स्‍कीम का नाम 2012-13 2013-14 2014-15 2015-16 2016-17 कुल
कॉर्बन चक्र अनुसंधान 20 30 40 40 40 170

 

Last Updated On 02/19/2015 - 12:02
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