ध्रुवीय विज्ञान और हिमांकमंडल

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दुनिया के ध्रुवीय क्षेत्र व उनके सन्निहित महासागर पहले से कहीं अधिक दिलचरपी पैदा कर रहे हैं। एक समय बंजर के रूप में माने गए, अगम्‍य उत्तर और दक्षिण ध्रुवीय क्षेत्रों को, जहां केवल खोजकर्ता जा सकते को वैज्ञानिक अनुसंधान के उच्च प्रोफ़ाइल साइटों के रूप में तब्दील कर दिया गया है। पिछले दो दशकों में वैश्विक जलवायु नियमन में ध्रुवीय क्षेत्र की भूमिका को समझने या चरम स्थितियों के तहत पारिस्थितिकी तंत्र अनुकूलनशीलता और अस्तित्व के अध्ययन के लिए, ध्रुवीय क्षेत्र के विज्ञान के क्षेत्र में दिलचस्‍पी काफी बढ़ी  है। वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए एक आधार के रूप में अंटार्कटिका के महत्व को समझते हुए भारत द्वारा वर्ष 1981 में अंटार्कटिका के लिए वार्षिक वैज्ञानिक अभियानों की शुरूआत की गई। इसके बाद वर्ष 2004 में देश ने दक्षिणी महासागर अनुसंधान के क्षेत्रों और तीन साल बाद आर्कटिक में सफलतापूर्वक पैठ बनाई। दोनों ध्रुवीय क्षेत्रों में भारतीय वैज्ञानिकों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए क्रमश: दोनों स्टेशनों "मैत्री" और "हिमाद्री" को अंटार्कटिक और आर्कटिक में जीवन-सह-अनुसंधान केंद्रों के रूप में सेवा करने के लिए स्थापित किया गया है। 2012 के दक्षिणी ग्रीष्‍मकाल के दौरान अंटार्कटिका में अन्य स्थायी अनुसंधान बेस चालू किया जाना प्रस्‍तावित है।

आर्कटिक और अंटार्कटिक में वैज्ञानिक अध्ययन के क्षेत्र काफी हद तक पृथ्वी, वायुमंडलीय और जीव विज्ञान तक सीमित है। जहां तक हिमांकमंडल के अध्ययन का संबंध है, भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा अंटार्कटिक में किए गए अनुसंधान प्रयासों में ड्रोनिंग मॉडलैंड में ग्लेशियरों की निगरानी, बर्फ की गतिशीलता का अध्ययन और ऊर्जा संतुलन एवं हिम क्रोड विश्लेषण से जलवायु पुनर्निर्माण शामिल है। आर्कटिक के हिमांकमंडल क्षेत्र का व्यवस्थित अध्ययन अभी तक शुरू नहीं किया गया है। ध्रुवीय क्षेत्र में मॉड्यूलेशन में ध्रुवीय हिम चोटी और समुद्री हिम के महत्‍व को ध्‍यान में रखते हुए, जो वैश्विक जलवायु को प्रभावित नहीं करती हैं, को बारहवीं योजना अवधि के दौरान हिमालय के साथ-साथ दोनों ध्रुवीय क्षेत्रों में हिमांकमंडल अध्ययन को एक प्रमुख राष्ट्रीय मिशन के रूप में आरंभ करने का प्रस्‍ताव है।

Last Updated On 06/18/2015 - 12:55
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