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ईएसएसओ के पास मौसम, जलवायु और संकट संबंधी पूर्वानुमान और सेवाओं और सामाजिक लाभ के लिए इसका व्यावहारिक उपयोग करने के लिए जनादेश प्राप्‍त है। ग्यारहवीं योजना के दौरान, ईएसएसआई ने मौसम, जलवायु और संकटों के पूर्वानुमान में सुधार के लिए पृथ्वी विज्ञान और समुद्र, वायुमंडल, हिमांकमंडल, भूमंडल और जीवमंडल प्रक्रियाओं की समझ में सुधार से संबंधित विभिन्न पहलुओं को समग्रता से संबोधित करने के लिए कई कार्यक्रम शुरू किए थे। इसके लिए, पृथ्वी प्रणाली के विभिन्न प्रक्रियाओं, विशेष रूप से विभिन्न घटकों अर्थात, भूमि, समुद्र, हिमांकमंडल और वायुमंडल के बीच होने वाली अंत:क्रिया को समझना महत्‍वपूर्ण है । इसलिए, बारहवीं योजना के दौरान, राष्ट्रीय महत्व के केंद्रित क्षेत्रों पर बहु संस्थागत और बहु-विषयक परियोजनाएं शुरू की जाएंगी।

मूल रूप से 1996 में शुरू किया गया भारतीय जलवायु अनुसंधान कार्यक्रम (आईसीआरपी) एक ऐसा कार्यक्रम है जिसमें अवलोकन अभियानों और परिणामों के विश्लेषण के माध्‍यम से विभिन्‍न समय-पैमानों पर मानसून और महासागरों (विशेष रूप से हिंद महासागर और भूमध्‍य हिंद महासागर) की परिवर्तनशीलता को समझा जाता है। 1999 में बंगाल की खाड़ी के मानसून प्रयोग (बॉबमेक्‍स) और 2002 और 2003 में अरब सागर मानसून प्रयोग (अर्मिक्‍स), के सफल अभियान के बाद, महाद्वीपीय उष्णकटिबंधीय अभिसरण जोन (सीटीसीजेड) कार्यक्रम पर अगला कार्यक्रम जिसे 11 वीं योजना अवधि में शुरू किया गया है उसे भारतीय मानसून क्षेत्र में संवहन / वर्षा की परिवर्तनशीलता को समझने पर फोकस के साथ 12 वीं योजना अवधि में जारी रखा जाएगा। ।

उत्सर्जन परिदृश्य परिवर्तन पर कार्यक्रम और मेगा शहरों पर वायुमंडलीय रसायन शास्त्र राष्ट्रीय महत्व का एक अन्य कार्यक्रम है। यह मानवीय गतिविधियों, ऐरोसोल वितरण और रासायनिक गुणों और जलवायु पर उनके प्रत्यक्ष / अप्रत्यक्ष प्रभाव (बादल वर्षा और क्षेत्रीय जल वैज्ञानिक चक्र) द्वारा लाए गए वर्तमान परिवर्तनों को समझने की दिशा पर लक्षित है। यह जरूरी है, कि मानवीय प्रभावों से प्राकृतिक भेदों को अलग करने के लिए वैश्विक जलवायु मॉडल में ऐरोसोल की रासायनिक संरचना का सही ढंग से प्रतिनिधित्व किया जाए। यह सतत निगरानी, क्षेत्र अवलोकनों और मॉडलिंग के अध्ययन के माध्यम से हासिल किया जा सकता है। भारत के लिए ऐरोसोल के फ्लक्‍सो के निर्यात की मात्रा से संबंधित मुद्दों का समाधान करने के लिए यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है कि बडे शहरों से उनके पूर्ववर्ती, बायोमास जलना और रेगिस्तान की धूल के साथ-साथ मानव गतिविधियों के तंत्र को समझा जाए जो भावी वातावरण के गतिशील और रासायनिक गुणों को बदल सकते हैं।

पृथ्‍वी-विज्ञान में जनशक्ति की भारी मांग को पूरा करने के लिए, एम टेक / पीएच डी कार्यक्रमों, पीठों की स्थापना और उत्कृष्टता केंद्र के उद्घाटन के माध्यम से कई शैक्षिक कार्यक्रम लगातार शुरू किए जाएंगे । भारतीय मौसम सेवाओं को अंतरराष्ट्रीय संगठनों के साथ सममूल्य पर लाने के लिए, नए के साथ-साथ विद्यमान एमओयू के तहत और अंतर्राष्‍ट्रीय प्रयोगशालाओं में वैज्ञानिक कर्मियों के स्‍पॉनसरशिप के माध्‍यम से कई अंतर्राष्‍ट्रीय सहयोगात्‍मक कार्यक्रम शुरु किए जाएंगे। मंत्रालय की विभिन्न इकाइयों की, परिचालन और सेवा वितरण संबंधी उन्मुख जिम्मेदारियों को ध्यान में रखते हुए वैज्ञानिक कर्मियों के आंतरिक प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से संस्थागत जानकारी का उन्नयन करने के लिए समुद्र विज्ञान और मौसम विज्ञान में अंतर्राष्‍ट्रीय ख्‍याति वाले पर्याप्‍त प्रशिक्षण मॉड्यूल पर ध्‍यान दिया जाएगा। भारत-अफ्रीका मंच के तहत भारत-अफ्रीका मध्यम अवधि मौसम पूर्वानुमान केन्‍द्र  खोलने का प्रस्ताव किया जा रहा है। मौसम की अनियमितता और विशाल समुद्री संसाधनों के बारे में लोगों के बीच जागरूकता लाने के उद्देश्य से प्रदर्शनियों, पोस्टर, प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिताओं के रूप में आउटरीच गतिविधियों के माध्यम से जागरूकता अभियान, का आयोजन जारी रहेगा। बारहवीं योजना के दौरान, गोवा में एक राष्ट्रीय समुद्री जल जीवशाला खोलने का प्रस्ताव है, जिससे समुद्री जीवन एवं समुद्री पारिस्थितिकी प्रणालियों के बारे में जागरूकता लाने और क्षेत्र में केंद्रित अनुसंधान के लिए अनुसंधान एवं विकास सुविधाओं के सृजन में भी मदद मिलेगी।